Geet Govind Lyrics – श्रित कमलाकुच मण्डल

॥ जय श्री कृष्ण ॥ 🦚 भारतीय संगीत और साहित्य के इतिहास में अगर प्रेम और भक्ति का सबसे मधुर संगम कहीं मिलता है, तो वह महाकवि जयदेव द्वारा रचित “गीत गोविन्द” (Geet Govind) में है।

आज हम जिस स्तुति की बात कर रहे हैं “श्रित कमलाकुच मण्डल” (Shrita Kamala Kucha Mandala), यह गीत गोविन्द की प्रथम अष्टपदी है। इसे भगवान विष्णु और श्री कृष्ण की महिमा में गाया जाता है। इसमें प्रभु के सौंदर्य, उनके अवतारों (जैसे राम, कृष्ण) और उनके द्वारा दुष्टों के संहार का मनमोहक वर्णन है।

जब हम गाते हैं “जय जय देव हरे”, तो यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि आत्मा की पुकार बन जाती है। ओडिसी नृत्य और शास्त्रीय संगीत में इस रचना का विशेष स्थान है। यह अष्टपदी मन को शीतलता और अलौकिक आनंद प्रदान करती है।

आइए, भगवान के दशावतार और उनकी लीलाओं का स्मरण करते हुए इस पवित्र अष्टपदी का पाठ करें।

जानकारी (Details)विवरण (Description)
भजन/स्तुतिगीत गोविन्द (श्रित कमलाकुच)
रचयितामहाकवि जयदेव (12वीं सदी)
ग्रंथगीत गोविन्दम् (Geet Govindam)
शैलीअष्टपदी (Sanskrit Hymn)
देवताश्री हरि विष्णु / श्री कृष्ण
भावसमर्पण और श्रृंगार भक्ति

गीत गोविन्द लिरिक्स हिन्दी मे

श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए।
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे॥

दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए।  
मुनिजनमानसहंस जय जय देव हरे ॥

कालियविषधरगंजन जनरंजन ए।
यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे ॥

मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए।
सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव हरे ॥

अमलकमलदललोचन भवमोचन ए।
त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे ॥

जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए।
समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे ॥

अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर ए।
श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे ॥

तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए।
कुरु कुशलंव प्रणतेषु जय जय देव हरे ॥

श्रीजयदेवकवेरुदितमिदं कुरुते मृदम् ।
मंगलमंजुलगीतं जय जय देव हरे ॥

राधे कृष्णा हरे गोविंद गोपाला नन्द जू को लाला ।
यशोदा दुलाला जय जय देव हरे ॥

Geet Govind Lyrics in English

Shrit kamalaa kuchh mandal dhrit kundal e,
Kalit lalit vanmaala
Jai Jai Dev Hare ॥

Dinmani mandal mandan bhav khandan e,
Munijan maanas hans
Jai Jai Dev Hare ॥

Kaaliya vishdhar ganjan jan ranjan e,
Yadu kul nalin dinesh
Jai Jai Dev Hare ॥

Madhu Mur Narak vinaashan Garud aasan e,
Surkul keli nidaan
Jai Jai Dev Hare ॥

Amal kamal dal lochan bhav mochan e,
Tribhuvan bhavan nidhaan
Jai Jai Dev Hare ॥

Janak suta krit bhooshan jit dushan e,
Samar shamit dashkanth
Jai Jai Dev Hare ॥

Abhinav jal-dhar sundar dhrit Mandar e,
Shri mukh chandra chakor
Jai Jai Dev Hare ॥

Tav charane pranata vayam iti bhaavay e,
Kuru kushalam pranateshu
Jai Jai Dev Hare ॥

Shri Jaydev kaver uditam idam kurute mridam,
Mangalam manjul geetam
Jai Jai Dev Hare ॥

Radhe Krishna Hare Govind Gopala,
Nand ju ko laala,
Yashoda dulaala
Jai Jai Dev Hare ॥

भावार्थ

इस अष्टपदी की हर पंक्ति का गहरा अर्थ है:

  1. श्रितकमलाकुच…: जो माता लक्ष्मी के हृदय (वक्षस्थल) पर निवास करते हैं, कानों में मकर कुंडल धारण किए हैं और वनमाला से सुशोभित हैं। हे देव! आपकी जय हो।
  2. दिनमणिमण्डलमण्डन…: आप सूर्य मंडल के आभूषण हैं, संसार के भय (भव) का खंडन करने वाले हैं और मुनियों के मन रूपी मानसरोवर के हंस हैं।
  3. कालियविषधरगंजन…: आपने कालिया नाग का मान मर्दन किया, यदुकुल रूपी कमल के लिए आप सूर्य के समान हैं।
  4. जनकसुताकृतभूषण…: (राम अवतार का वर्णन) आप सीता जी के आभूषण हैं (उनके गौरव हैं), आपने खर-दूषण और रावण (दशकंठ) का वध किया।
  5. तव चरणे प्रणता…: हम आपके चरणों में नतमस्तक हैं, हे प्रभु! अपने शरणागत भक्तों का कुशल (कल्याण) करें।

गीत गोविन्द पाठ के लाभ

  • कला और संगीत: जो लोग संगीत सीखते हैं, उनके लिए यह रचना स्वर और ताल का उत्तम अभ्यास है।
  • भक्ति रस: इसके पाठ से मन में भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव जागृत होता है।
  • शांति: यह स्तुति मानसिक तनाव को दूर कर मन को शांत करती है।

Conclusion (निष्कर्ष)

“जय जय देव हरे” की गूंज हमें यह याद दिलाती है कि ईश्वर हर रूप में—चाहे वह राम हों या कृष्ण—भक्तों के रक्षक हैं। महाकवि जयदेव की यह रचना सदियों से भारतीय संस्कृति की धरोहर रही है। इसे नित्य गाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

🙏 राधे-राधे! 🙏 क्या आपको संस्कृत भजनों का अर्थ जानना अच्छा लगता है? कमेंट में “Jai Shri Krishna” लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं।

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